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बिहार के एक छोटे से गांव सब्जीपुर के किनारे एक बहुत पुरानी और टूटी-फूटी भूतिया हवेली खड़ी थी। गांव वाले कहते थे कि उस हवेली में रात होते ही रोने की आवाज़, जंजीरों की खनक, और खिड़कियों के अपने-आप खुलने-बंद होने की आवाज़ आती है। कई सालों से कोई भी उस हवेली के पास जाने की हिम्मत नहीं करता था। गांव में एक गरीब लेकिन बहादुर लड़का रहता था — आलू। आलू अपनी मां और छोटी बहन मूली के साथ रहता था। एक रात, गांव में अचानक खबर फैली कि टमाटर काका का छोटा बेटा लापता हो गया। कुछ लोगों ने दावा किया कि आखिरी बार उसे भूतिया हवेली के पास देखा गया था। पूरा गांव डर गया। कोई भी हवेली की तरफ जाने को तैयार नहीं था। लेकिन आलू का दिल मानने को तैयार नहीं हुआ। उसने सोचा, “अगर सच में कोई बच्चा वहां फंसा है, तो उसे बचाना ही होगा।” अगली रात, हाथ में लालटेन और जेब में अपनी मां का दिया हुआ छोटा ताबीज़ लेकर आलू अकेला हवेली की ओर निकल पड़ा। हवेली के पास पहुंचते ही ठंडी हवा चलने लगी। टूटी हुई खिड़कियां ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगीं। अंदर से किसी के रोने की हल्की आवाज़ आ रही थी। आलू ने कांपते हुए हवेली का बड़ा दरवाज़ा धक्का देकर खोला। अंदर पूरा अंधेरा था। दीवारों पर जाले, फर्श पर धूल, और हर तरफ टूटी हुई तस्वीरें पड़ी थीं। जैसे ही वह आगे बढ़ा, अचानक ऊपर से एक झूमर जोर से गिरा। आलू बाल-बाल बचा। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। तभी उसे हवेली के सबसे पीछे वाले कमरे से बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी। आलू धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़ा। कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर उसने देखा — एक सफेद साड़ी पहनी हुई भूतनी जैसी औरत खिड़की के पास खड़ी थी, और उसके सामने टमाटर काका का बेटा डरा-सहमा बैठा था। आलू का गला सूख गया। लेकिन तभी उस औरत ने धीरे-धीरे मुड़कर आलू की तरफ देखा… उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, दर्द था। वह औरत बोली, “डरो मत… मैं किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती…” आलू हैरान रह गया। भूतनी ने बताया कि वह इस हवेली की पुरानी मालकिन की बेटी कद्दू रानी की आत्मा है। कई साल पहले, गांव के लालची करेला सेठ ने इस हवेली की जमीन हथियाने के लिए हवेली में आग लगवा दी थी। उस हादसे में कद्दू रानी और उसके माता-पिता की मौत हो गई। मरते समय कद्दू रानी की एक ही इच्छा अधूरी रह गई — “मेरे माता-पिता के असली गुनहगार को सजा मिले।” तब से उसकी आत्मा हवेली में भटक रही थी। उसने टमाटर काका के बेटे को नुकसान नहीं पहुंचाया था। असल में बच्चा हवेली के पास खेलते-खेलते गिर पड़ा था, और कद्दू रानी की आत्मा उसे अंदर लाकर बचा रही थी। लेकिन गांव वाले हर चीज़ को भूत का डर समझते रहे। आलू ने पहली बार महसूस किया कि हवेली में भूत नहीं, दर्द कैद था। कद्दू रानी ने आलू को हवेली के तहखाने में छिपा एक पुराना संदूक दिखाया। उस संदूक में हवेली के असली कागज़, पुरानी तस्वीरें और करेला सेठ के गुनाहों के सबूत थे। आलू समझ गया कि यही मौका है सच को सबके सामने लाने का। सुबह होते ही आलू पूरे गांव को हवेली के सामने ले आया। करेला सेठ भी वहां पहुंचा और चिल्लाने लगा कि हवेली में भूत है, कोई अंदर मत जाओ। लेकिन आलू ने सबके सामने संदूक खोल दिया। उसमें मौजूद सबूत देखकर पूरे गांव के होश उड़ गए। अब सच सबके सामने था — हवेली का असली राक्षस भूत नहीं, करेला सेठ था। गांव वालों ने करेला सेठ को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। कद्दू रानी की आत्मा को आखिरकार इंसाफ मिल गया। उस रात पहली बार हवेली से रोने की आवाज़ नहीं आई। बल्कि खिड़की से एक हल्की सफेद रोशनी निकली… और हवा में जैसे किसी ने मुस्कुराकर कहा — “धन्यवाद, आलू…” टमाटर काका का बेटा सुरक्षित घर लौट आया। गांव वालों का डर खत्म हो गया। और उस दिन के बाद सब्जीपुर की भूतिया हवेली, डर की जगह नहीं, एक अधूरी आत्मा को मिले इंसाफ की कहानी बन गई।
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